हाल के सालों में अन्य अल्पसंख्यकों की तरह ही पाकिस्तान में ईसाइयों पर भी हमले बढ़े हैं.
ईसाइयों के रिहायशी इलाक़ों और धर्मस्थलों पर हुए अधिकतर हमलों की वजह देश का विवादस्पद ईशनिंदा क़ानून ही है.
लेकिन इन हमलों की अन्य राजनीतिक वजहें भी रही हैं.
बीबीसी संवाददाता इलियास ख़ान बता रहे हैं पाकिस्तान के ईसाई समुदाय और उसके मुद्दों के बारे में.
पाकिस्तान में कितने ईसाई हैं?
पाकिस्तान एक मुस्लिम बहुल देश है, जहां हिंदू सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी हैं. यहां की कुल जनसंख्या में क़रीब 1.6 प्रतिशत हिंदू हैं.
लेकिन दक्षिणी तटीय शहर कराची और लाहौर और फ़ैसलाबाद शहरों में ईसाइयों की भी अच्छी-ख़ासी आबादी है.
पंजाब प्रांत में भी ईसाइयों के गांव ठीक-ठाक तादाद में हैं. यही नहीं रूढ़ीवादी माने जाने वाले देश के उत्तर-पश्चिमी प्रांत ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के पेशावर शहर में भी ईसाई समुदाय के लोग रहते हैं.
भारत के बंटवारे से पहले आज का पाकिस्तान विविध संस्कृतियों और धर्मों वाला इलाक़ा था. लेकिन हाल के दशकों में पाकिस्तान का इस्लामीकरण हुआ है और समाज भी अधिक इस्लामिक हुआ है. इससे देश में असहिष्णुता भी बढ़ी है.
कभी पाकिस्तान के शहरों में अल्पसंख्यकों की तादाद 15 फ़ीसदी तक थी. अब ये घटकर चार फ़ीसदी ही रह गई है.
क्या पाकिस्तान में ईसाइयों का कोई प्रभाव है?
पाकिस्तान के अधिकतर ईसाई दलित हिंदू थे, जिन्होंने ब्रितानी शासनकाल के दौरान ईसाई धर्म अपनाया. इसकी एक वजह जाति-व्यवस्था भी थी.
इनमें से बहुत से सेना के कैंट वाले शहरों में मज़दूरी किया करते थे. आज भी पाकिस्तान के हर कैंट शहर में एक लाल कुर्ती नाम का इलाक़ा होता है. इसी में ईसाई रहते हैं.
लेकिन आज भी ईसाई पाकिस्तान का सबसे ग़रीब समुदाय है और ये आज भी छोटे-मोटे काम ही करते हैं. पंजाब में बहुत से ऐसे गांव हैं जिनकी पूरी आबादी ईसाई है. ये लोग मज़दूरी करते हैं या ज़मीदारों के खेतों में काम करते हैं.
हालांकि ईसाई समुदाय में भी एक प्रभावशाली तबका है. ये अच्छे पढ़े लिखे लोग अधिकतर कराची में रहते हैं. ये ब्रितानी राज के दौरान गोवा से आकर यहां बसे थे.
हालांकि अमीर ईसाई हों या ग़रीब ईसाई, लेकिन सबके बीच एक बेचारगी का माहौल तो है ही. इसी वजह से पाकिस्तान के अमीर ईसाई देश छोड़कर जा रहे हैं.
ये कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बस रहे हैं. देश में ईसाइयों के प्रति असहिष्णुता का माहौल उनकी बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा है.
क्यों हो रहे हैं ईसाइयों पर हमले?
पाकिस्तान में यूं तो आमतौर पर मुसलमान और ईसाई मिल जुलकर रहते हैं, लेकिन ईशनिंदा के आरोपों की वजह से अक्सर ईसाइयों पर उन्मादी मुसलमानों की भीड़ के हमले होते रहे हैं.
यही नहीं इस्लामी चरमपंथ के निशाने पर भी ईसाई समुदाय रहा है.
हाल ही में ये बड़े हमले ईसाइयों पर हुए हैं-
दिसंबर 2017 में क्वेटा के एक चर्च पर हुए हमले में नौ लोग मारे गए और 57 घायल हुए.
मार्च 2016 में लाहौर के एक पार्क में ईस्टर मना रहे ईसाइयों पर हुए हमले में 70 लोग मारे गए और 340 से ज़्यादा घायल हुए.
मार्च 2015 में लाहौर के चर्चों में हुए दो बम धमाकों में 14 लोग मारे गए और 70 से अधिक घायल हुए.
2013 में पेशावर के चर्च में हुए दो बम धमाकों में कम से कम 80 लोग मारे गए थे.
2009 में पंजाब के गोजरा क़स्बे में भीड़ ने ईसाइयों के घरों पर हमला किया. 40 से घर जला दिए गए और नौ लोग मारे गए.
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